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MediabhartiHindi
2020-06-23

कृष्ण को समझने के लिए बलराम को जानना है बेहद जरूरी

credit: third party image reference

मथुरा, वृंदावन सहित संपूर्ण ब्रज क्षेत्र को भगवान श्री कृष्ण के बचपन की गतिविधियों के मुख्य केंद्र के रूप में जाना जाता है। लेकिन, इस काल में कृष्ण के कार्यों या कहें कि उनकी लीलाओं को समझने के लिए बल, पराक्रम और मर्यादा के प्रतीक उनके बड़े भाई बलराम के व्यक्तित्व को भी समझना बेहद जरूरी है।

विभिन्न कथाओं के अनुसार बलराम को बल्देव, बलदाऊ आदि कई दूसरे नामों से भी जाना जाता है। बलराम वसुदेव और देवकी के सातवें पुत्र थे, जिन्हें कंस के अत्याचारों से बचाने के लिए योग माया के जरिए उनकी ज्येष्ठ पत्नी रोहिणी के गर्भ में प्रतिस्थापित किया गया था।

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आधिकारिक रूप से भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था जबकि बलराम का जन्म उनसे पहले भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में हुआ माना जाता है। इस तरह, बलराम उम्र में भगवान श्री कृष्ण से 11 महीने और 16 दिन बड़े थे। कृष्ण के जन्मोपरान्त, पूरे ब्रज मंडल में उनकी लीलाएं अगले 10 साल तक बलराम के संरक्षण में ही चलती रहीं। चूंकि, ब्रज भाषा की लोक संस्कृति में अपने से बड़े को सम्बोधन में ‘दाऊजी’ ही कहा जाता है, इसलिए बड़ा भाई होने के नाते उन्हें ‘दाऊजी’ भी कहा जाता है।

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कंस के वध के बाद दोनों भाई ब्रज को छोड़कर गुजरात के रेवत पर्वत और फिर अग्नि पर्वत तथा बाद में द्वारका चले गए। वहां भगवान श्री कृष्ण द्वारकाधीश कहलाए। वहीं, बलराम का विवाह राजा रेवत की पुत्री रेवती के साथ विवाह हुआ। विवाहोपरांत, बलराम अपनी पत्नी रेवती के साथ बाबा नन्द और माता यशोदा के पास ब्रज में ही आ गए। अतः ब्रज के संरक्षक होने से उन्हें ‘ब्रज राज’ की उपाधि से भी विभूषित किया जाता है।

उदान्त चरित्र, पराक्रम और न्यायप्रिय होने के कारण उस कालखंड में बलराम का बड़ा सम्मान था जो कि उनकी चारित्रिक विशिष्टता का परिचायक है। 

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